Gyan ke Baatein

“ज्ञान की बातें”
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जिन्दगी में जितना हो सके दो चीजों से हमेशा दूरी बना के रखना। पहला दिखना और दूसरा दुखाना। दिखना यानि दिखावा, जो कुछ आप हैं नहीं दूसरों के सामने वो बनना, अथवा वो क्षणिक व्यवहार जो आप द्वारा एक व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए उसके साथ किया जाता है।

दुखाना यानि अपने दुर्व्यवहार से दूसरे आदमी को हतोत्साहित करना, अपमान करना, किसी की उपेक्षा करना। वाणी का वाण बन जाना ही दुखाना है।

इबादत घर छोड़कर ही नहीं होती, घर जोड़कर भी हो जाती है। इबादत भेष बदलने से ही नहीं होती, भाषा बदलने से भी हो जाती है। और बहुत बड़ा भंडारा लगाकर ही नहीं होती, किसी भूखें को एक रोटी खिलाकर भी हो जाती है।

कभी-कभी भक्त भी जाने या अनजाने अथवा किसी विगत पापमय आचरण के कारण कुछ पाप कर्म कर बैठता है ।

किन्तु यदि यह सोचकर कि “मुझे यह नहीं करना चाहिए था, किन्तु मैं इतना पापी हूँ कि मैंने फिर यह पाप किया ।” सच्चे मन से पश्चाताप करता है तो भगवान इस पछतावे के आधार पर उसे क्षमा कर देते हैं ।

किन्तु यदि वह जान-बूझकर इस आशा के साथ पाप कर्म करता है कि भगवान उसे क्षमा तो कर ही देंगे, क्योंकि वह हरे कृष्ण मन्त्र का उच्चारण करता है तो वह क्षमा के योग्य नहीं माना जाता है।

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