Hindi Stories

Mangal Kaamna – Buddha Story

मंगल कामना
बुद्ध अपने भिक्षुओं से कहते थे कि तुम चौबीस घण्टे, राह पर कोई दिखे उसकी मंगल की कामना करना।
वृक्ष भी मिल जाए तो उसकी मंगल की कामना करके उसके पास से गुजरना।
 पहाड़ भी दिख जाए तो मंगल की कामना करके उसके निकट से गुजरना।
 राहगीर दिख जाए अनजान, तो उसके पास से मंगल की कामना करके राह से गुजरना।
एक भिक्षु ने पूछा, इससे क्या फायदा
 बुद्ध ने कहा, इसके दो फायदे हैं।
पहला तो यह कि तुम्हें गाली देने का अवसर न मिलेगा। तुम्हें बुरा खयाल करने का अवसर न मिलेगा। तुम्हारी शक्ति नियोजित हो जाएगी मंगल की दिशा में।
और दूसरा फायदा यह कि जब तुम किसी के लिये मंगल की कामना करते हो तो तुम उसके भीतर भी रिजोनेंस, प्रतिध्वनि पैदा करते हो।वह भी तुम्हारे लिए मंगल की कामना से भर जाता है।

व्यस्त रहे मस्त रहे | Be Busy Be Happy

व्यस्त रहे मस्त रहे….
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क्या आप किसी बात से परेशान हे ? ?
तो कृपया मत परेशान हो और हमेशा मस्त रहें व्यस्त रहें क्योंकि…

40 साल की अवस्था में “उच्च शिक्षित” और “अल्प शिक्षित” एक जैसे ही होते हैं। (बल्कि अल्प शिक्षित अधिक कमा लेते हैं)

50 साल की अवस्था में “रूप” और “कुरूप” एक जैसे ही होते हैं। (आप कितने ही सुन्दर क्यों न हों झुर्रियां, आँखों के नीचे के डार्क सर्कल छुपाये नहीं छुपते)

60 साल की अवस्था में “उच्च पद” और “निम्न पद” एक जैसे ही होते हैं। (चपरासी भी अधिकारी के सेवा निवृत्त होने के बाद उनकी तरफ़ देखने से कतराता है)

70 साल की अवस्था में “बड़ा घर” और “छोटा घर” एक जैसे ही होते हैं। (घुटनों का दर्द और हड्डियों का गलना आपको बैठे रहने पर मजबूर कर देता है, आप छोटी जगह में भी गुज़ारा कर सकते हैं)

80 साल की अवस्था में आपके पास धन का “होना” या “ना होना” एक जैसे ही होते हैं। ( अगर आप खर्च करना भी चाहें, तो आपको नहीं पता कि कहाँ खर्च करना है)

और 90 साल की अवस्था में “सोना” और “जागना” एक जैसे ही होते हैं। (जागने के बावजूद भी आपको नहीं पता कि क्या करना है)

अपने जीवन को हमेशा सामान्य रुप में ही लें क्योंकि जीवन में रहस्य नहीं हैं जिन्हें आप सुलझाते फिरें। आगे चलकर एक दिन हम सबकी यही स्थिति होनी है, इसलिए चिंता, टेंशन छोड़ कर अपना जीवन अपने हिसाब से जिये और हमेशा मस्त रहें स्वस्थ रहें।

यही जीवन है और इसकी सच्चाई भी।

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Drishti aur Shrishti

दृष्टि और सृष्टि……
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जब हमारी दृष्टि कमजोर हो जाती है तब हमें सारी चीजें धुंधली दिखाई देने लगती हैं ! क्या वास्तव में चीजें धुंधली होती हैं ? नही न ! बस एक चश्मा लगाते ही सब धुंधलापन समाप्त हो जाता है ।

इसी प्रकार इस संसार के प्रति जब हमारी दृष्टि दोषपूर्ण हो जाती है तो इस संसार में संसार की वस्तुओं में हमे दोष, दुःख दिखाई देने लगता है।

वस्तु में न तो सुख है, न दुःख है। ये दोष या गुण हमारी दृष्टि में है। यदि वस्तु अच्छी या बुरी होती तो वो साड़ी जो आपको अच्छी लगी और आप खरीद कर ले आये । वह साड़ी अनेक लोगों द्वारा रिजेक्ट की जा चुकी होती है।

ऐसे ही जो आपने नापसंद कीया वह भी किसी के द्वारा पसंद की जाती है। इससे सिद्ध होता है कि गुण दोष वस्तु में नहीं है। हमारी दृष्टि में है। इसलिए ये पक्का है कि संसार और वस्तुए न सुख देती हैं न दुःख ! न अच्छी हैं न बुरी।

हमारी दृष्टि ही इसका कारण है। अतः यदि सुख शान्ति चाहिए तो केवल और केवल दृष्टि को बदलना होगा। दृष्टि बदलते ही सृष्टि बदल जायेगी। हर जगह, हर हाल में, हर बात में आनंद खोजना है बस। यदि 100 व्यक्ति हमसे अधिक धनवान हैं तो अनेक व्यक्तियों से हम अधिक धनवान हैं।

जो प्राप्त है उसमे आनंदित हो। उसमे पूरा संतुष्ट रहें । अभाव अभाव न रोते रहें। मस्त रहें। क्योंकि हमारे पास कुछ भी कितना भी अधिक हो जाय फिर भी अनेकों से कम ही होगा और अनेकों से अधिक।

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Beti ka Ghar

बेटी का घर….
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सारिका बहुत प्रसन्न थी आज। आखिरकार बीस सालों की कड़ी मेहनत के बाद जमा रकम से घर खरीदने का उसका सपना पूरा होने जा रहा था। वो बेचैनी से अपने पति अनंत के आने का इंतज़ार कर रही थी। अनंत के आने पर सारिका ने उसे ये खुशखबरी दी और साथ चलकर घर देखने के लिए कहा।

अनंत ने कहा – एक और घर की क्या जरूरत है ? ये घर तो है ही।
सारिका ने कहा – जरूरत है अनंत, हमारी बेटी के लिए।
तुम्हें क्या लगता है मैं अपनी बेटी की शादी किसी सड़क छाप से करूँगा जो उसे अलग से घर की जरूरत पड़ेगी- अनंत ने कहा।
सारिका बोली- नहीं अनंत। मैं बस ये चाहती हूँ कि इस दुनिया में एक जगह ऐसी हो जिस पर सिर्फ मेरी बेटी का हक हो। जहां से उसे कोई भी किसी भी वजह से निकाल ना सके।

अनंत ने हैरान होते हुए कहा- क्या मतलब ?
सारिका बीते दिनों को याद करते हुए बोली – याद है एक बार किसी बात पर झगड़ा होने पर तुमने मुझसे कहा था, निकल जाओ मेरे घर से। रोते हुए जब मैं मायके पहुँची तो माँ-पापा, भैया-भाभी ने साफ शब्दों में कह दिया, अब तुम्हारे पति का घर ही तुम्हारा घर है। यहां तुम बस मेहमान हो।

तुम थोड़ी ही देर में मुझे मनाने आ गए थे, लेकिन उसी वक्त मैंने तय कर लिया था कि मैं अपनी बेटी को इन शब्दों का सामना करने नहीं दूँगी। उसके पास मायके और ससुराल के अलावा उसका एक घर भी होगा।
अनंत सारिका की बातें सुनकर खुद पर लज्जित हो रहा था।

उसने कहा – लेकिन अगर भविष्य में हमारे बेटे ने विरोध किया, जायदाद के लिए अपनी बहन को परेशान किया तो ?
सारिका ने कहा – मैंने सब पता कर लिया है। चूँकि ये घर पैतृक नहीं है तो मैं इसे किसी को भी दे सकती हूँ। लेकिन फिर भी मैं एनओसी पर हमारे बेटे के दस्तखत करवा के ही अपनी बेटी को ये घर दूँगी, ताकि भविष्य में उसे किसी परेशानी का सामना ना करना पड़े। बेटे के लिए तो तुम्हारा ये घर है ही। मुझे यकीन है इसके बाद उसे कोई आपत्ति नहीं होगी।

सारिका की सारी बातें सुनकर अनंत ने कहा – कितना सोचती हो तुम। मैं इतना सोचूँ तो पागल ही हो जाऊँ।
सारिका ने हँसते हुए कहा – सोचना पड़ता है, क्योंकि तुम्हारे पास घर है, हम औरतों की तरह मायका और ससुराल नहीं।

अनंत ने सारिका का हाथ थामते हुए कहा – मेरी गलती के लिए मुझे क्षमा कर दो सारिका। आओ चलो हम अपनी बेटी के लिए उसका घर पसंद करने चलें। नए घर में कदम रखते हुए सारिका की आँखों में संतुष्टि के भाव थे और अनंत की आँखों में अपनी पत्नी के लिए गर्व झलक रहा था।

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From a Doctor’s Pen

एक डॉक्टर की डायरी से….

कैसे कैसे कमाल के रोगी आते हैं ! भले ही कैसे भी तेल मे तले हुए वडे, समोसे खाते हैं, कैसे भी पानी में भरी हुई पानीपुरी खाते जाते हैं, कीटनाशक से भरपूर फल-सब्जी खाते हैं और तो और पैसा खर्च कर काला जहर यानी कोक व पेप्सी गटगट पी जाते हैं और तम्बाकू ऐसे खाते हैं जैसे कल दुनिया खत्म होने वाली है।

यह सब भी बिना किसी आपत्ति के ! लेकिन जैसे ही दवाई की पर्ची हाथ में दो तो तुरंत पूछते हैं कि डॉक्टर साहब, इस का कोई “साइड इफेक्ट” तो नहीं !!

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Ishwar Satya Hai

ईश्वर ‘सत्य’ हे….
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1970 के समय तिरुवनंतपुरम में समुद्र के पास एक बुजुर्ग भगवद्गीता पढ़ रहे थे, तभी एक नास्तिक और होनहार नौजवान उनके पास आकर बैठा, उसने उन पर कटाक्ष किया कि लोग भी कितने मूर्ख है विज्ञान के युग मे गीता जैसी ओल्ड फैशन्ड बुक पढ़ रहे है।

उसने उन सज्जन से कहा कि आप यदि यही समय विज्ञान को दे देते तो अब तक देश ना जाने कहाँ पहुँच चुका होता, उन सज्जन ने उस नौजवान से परिचय पूछा तो उसने बताया कि वो कोलकाता से है और विज्ञान की पढ़ाई की है अब यहाँ भाभा परमाणु अनुसंधान में अपना कैरियर बनाने आया है।

आगे उसने कहा कि आप भी थोड़ा ध्यान वैज्ञानिक कार्यो में लगाये भगवद्गीता पढ़ते रहने से आप कुछ हासिल नही कर सकोगे। सज्जन मुस्कुराते हुए जाने के लिये उठे, उनका उठना था की 4 सुरक्षाकर्मी वहाँ उनके आसपास आ गए, आगे ड्राइवर ने कार लगा दी जिस पर लाल बत्ती लगी थी।

लड़का घबराया और उसने उनसे पूछा आप कौन है ? उन सज्जन ने अपना नाम बताया ‘विक्रम साराभाई’ जिस भाभा परमाणु अनुसंधान में लड़का अपना कैरियर बनाने आया था उसके अध्यक्ष वही थे। उस समय विक्रम साराभाई के नाम पर 13 अनुसंधान केंद्र थे, साथ ही साराभाई को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने परमाणु योजना का अध्यक्ष भी नियुक्त किया था।

अब शर्मसार होने की बारी लड़के की थी वो साराभाई के चरणों मे रोते हुए गिर पड़ा। तब साराभाई ने बहुत अच्छी बात कही, उन्होंने कहा कि “हर निर्माण के पीछे निर्माणकर्ता अवश्य है। इसलिए फर्क नही पड़ता ये महाभारत है या आज का भारत, ईश्वर को कभी मत भूलो।”

आज नास्तिक गण विज्ञान का नाम लेकर कितना नाच ले मगर इतिहास गवाह है कि विज्ञान ईश्वर को मानने वाले आस्तिकों ने ही रचा है, ईश्वर ही सत्य है।

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Gyan ke Baatein

“ज्ञान की बातें”
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जिन्दगी में जितना हो सके दो चीजों से हमेशा दूरी बना के रखना। पहला दिखना और दूसरा दुखाना। दिखना यानि दिखावा, जो कुछ आप हैं नहीं दूसरों के सामने वो बनना, अथवा वो क्षणिक व्यवहार जो आप द्वारा एक व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए उसके साथ किया जाता है।

दुखाना यानि अपने दुर्व्यवहार से दूसरे आदमी को हतोत्साहित करना, अपमान करना, किसी की उपेक्षा करना। वाणी का वाण बन जाना ही दुखाना है।

इबादत घर छोड़कर ही नहीं होती, घर जोड़कर भी हो जाती है। इबादत भेष बदलने से ही नहीं होती, भाषा बदलने से भी हो जाती है। और बहुत बड़ा भंडारा लगाकर ही नहीं होती, किसी भूखें को एक रोटी खिलाकर भी हो जाती है।

कभी-कभी भक्त भी जाने या अनजाने अथवा किसी विगत पापमय आचरण के कारण कुछ पाप कर्म कर बैठता है ।

किन्तु यदि यह सोचकर कि “मुझे यह नहीं करना चाहिए था, किन्तु मैं इतना पापी हूँ कि मैंने फिर यह पाप किया ।” सच्चे मन से पश्चाताप करता है तो भगवान इस पछतावे के आधार पर उसे क्षमा कर देते हैं ।

किन्तु यदि वह जान-बूझकर इस आशा के साथ पाप कर्म करता है कि भगवान उसे क्षमा तो कर ही देंगे, क्योंकि वह हरे कृष्ण मन्त्र का उच्चारण करता है तो वह क्षमा के योग्य नहीं माना जाता है।

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Real Beggar – Interesting Story

असली भिखारी…..
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अपनी नई नवेली दुल्हन प्रिया को शादी के दूसरे दिन ही दहेज मे मिली नई चमाचमाती गाड़ी से शाम को रवि लॉन्ग ड्राइव पर लेकर निकला ! गाड़ी बहुत तेज भगा रहा था। प्रिया ने उसे ऐसा करने से मना किया

तो वो बोला – अरे जानेमन ! मजे लेने दो। आज तक दोस्तों की गाड़ी चलाई है। आज अपनी गाड़ी है। सालों की तमन्ना पूरी हुई। मैं तो खरीदने की सोच भी नही सकता था। इसीलिए तुम्हारे डैड से मांग करी थी।
प्रिया बोली : अच्छा, म्यूजिक तो कम रहने दो, आवाज कम करते प्रिया बोली।

तभी अचानक उनकी गाड़ी के आगे एक भिखारी आ गया। बडी मुश्किल से ब्रेक लगाते, पूरी गाड़ी घुमाते रवि ने बचाया। मगर तुरंत उसको गाली देकर बोला – अबे मरेगा क्या भिखारी साले, देश को बरबाद करके रखा है तुम लोगों ने।

तब तक प्रिया गाड़ी से निकलकर उस भिखारी तक पहुंची और देखा तो बेचारा अपाहिज था। उससे माफी मांगते हुए और पर्स से 100 ₹ निकालकर उसे देकर बोली – माफ करना काका, वो हम बातों मे थे कही चोट तो नहीं आई आपको ? ये लीजिए हमारी शादी हुई है मिठाई खाइएगा और आर्शिवाद दीजिएगा।

कहकर उसे साइड में फुटपाथ पर ले जाकर बिठा दिया। भिखारी दुआएं देने लगा। प्रिय जैसे ही गाड़ी मे वापस बैठी तब रवि उससे बोला : तुम जैसों की वजह से इनकी हिम्मत बढती है ऐसे भिखारीयो को कभी मुंह नही लगाना चाहिए।

प्रिया मुसकुराते हुए बोली – रवि, भिखारी तो मजबूर था इसीलिए भीख मांग रहा था वरना सब कुछ सही होते हुए भी लोग भीख मांगते हैं दहेज लेकर। जानते हो खून पसीना मिला होता है गरीब लड़की के माँ-बाप का इस दहेज मे और लोग, तुमने भी तो पापा से गाड़ी मांगी थी तो कौन भिखारी हुआ ? वो मजबूर अपाहिज या ? ? ?

एक बाप अपने जिगर के टुकड़े को 20 वर्षों तक संभालकर रखता है। फिर दूसरे को दान करता है जिसे इस दुनिया मे कन्यादान “महादान” तक कहा जाता है ताकि दूसरे का परिवार चल सके उसका वंश बढे और किसी की नई गृहस्थी शुरू हो। उस पर दहेज मांगना भीख नही तो क्या है ? बोलो तुम ही बताओ ? ?

कौन हुआ भिखारी वो मजबूर अपाहिज या तुम जैसे दूल्हे ! ! रवि एकदम खामोश नीची नजरें किए शर्मिंदगी से सब सुनता रहा क्योंकि, प्रिया की बातों से पडे तमाचे ने उसे बता दिया था कि कौन है असली भिखारी….।

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“सकारात्मक” अभ्यास Positive Practice

“सकारात्मक” अभ्यास…..
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एक महिला और उसका पति एक सर्कस में काम करते थे। महिला स्टेज में एक जगह खड़ी हो जाती थी और पति बिना देखे (आंख पर पट्टी बांधकर) तीर उसकी ओर मारता था जिससे उसके चारो ओर तीरों की डिजाइन बन जाती थी। उसके हर तीर के साथ तालियाँ बजती थी। एक दिन दोनों में खूब तकरार हो गई।

पति को इतना गुस्सा आया कि उसने सर्कस के खेल में ही उसे मारने का मन बना लिया। रोज़ की तरह उस दिन भी तमाशा शुरू हुआ। उस व्यक्ति ने स्त्री को मारने के लक्ष्य करके तीर मारा। पर यह क्या, फिर तालियों की गडगड़ाहट। उसने जैसे अपनी आँखे की पट्टी खोली तो वह भी हैरान रह गया। तीर पहले की तरह ही आज भी स्त्री को छूते हुए किनारे लग जाता था।

यह है अभ्यास। क्योंकि उसको ऐसे ही अभ्यास था तो वह चाहकर भी गलत तीर नही मार सका। इस प्रकार जब हमारे मन मे सकारात्मक सोचने का अभ्यास हो जाता है तो वही मन अपने आप ही वश में रह कर अच्छे कार्य की ओर लग जाता है, और चाह कर भी गलत रास्ते पर नहीं चलता।

फर्क सिर्फ सोच का होता है, सकारात्मक या नकारात्मक। वरना तो सीढियां वही होती है, जो किसी के लिए ऊपर जाती हैं, और किसी के लिए नीचे आती है। हम जब हमेशा ही सकारात्मक सोचेंगे तो हमारे अंदर सदा उत्साह, उमंग की ऊर्जा बनी रहेगी। इसलिए सदैव सकारात्मक रहे और खुश रहे।

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