Motivational Stories

Jo Log Mere Peeth Peche ….

जो लोग मेरी पीठ पीछे मेरी बुराई करते है उन्हें मैं बहुत पसंद करता हूँ,
क्योंकि ये वो लोग है जो निःशुल्क मेरा प्रचार करते है

 

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व्यस्त रहे मस्त रहे | Be Busy Be Happy

व्यस्त रहे मस्त रहे….
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क्या आप किसी बात से परेशान हे ? ?
तो कृपया मत परेशान हो और हमेशा मस्त रहें व्यस्त रहें क्योंकि…

40 साल की अवस्था में “उच्च शिक्षित” और “अल्प शिक्षित” एक जैसे ही होते हैं। (बल्कि अल्प शिक्षित अधिक कमा लेते हैं)

50 साल की अवस्था में “रूप” और “कुरूप” एक जैसे ही होते हैं। (आप कितने ही सुन्दर क्यों न हों झुर्रियां, आँखों के नीचे के डार्क सर्कल छुपाये नहीं छुपते)

60 साल की अवस्था में “उच्च पद” और “निम्न पद” एक जैसे ही होते हैं। (चपरासी भी अधिकारी के सेवा निवृत्त होने के बाद उनकी तरफ़ देखने से कतराता है)

70 साल की अवस्था में “बड़ा घर” और “छोटा घर” एक जैसे ही होते हैं। (घुटनों का दर्द और हड्डियों का गलना आपको बैठे रहने पर मजबूर कर देता है, आप छोटी जगह में भी गुज़ारा कर सकते हैं)

80 साल की अवस्था में आपके पास धन का “होना” या “ना होना” एक जैसे ही होते हैं। ( अगर आप खर्च करना भी चाहें, तो आपको नहीं पता कि कहाँ खर्च करना है)

और 90 साल की अवस्था में “सोना” और “जागना” एक जैसे ही होते हैं। (जागने के बावजूद भी आपको नहीं पता कि क्या करना है)

अपने जीवन को हमेशा सामान्य रुप में ही लें क्योंकि जीवन में रहस्य नहीं हैं जिन्हें आप सुलझाते फिरें। आगे चलकर एक दिन हम सबकी यही स्थिति होनी है, इसलिए चिंता, टेंशन छोड़ कर अपना जीवन अपने हिसाब से जिये और हमेशा मस्त रहें स्वस्थ रहें।

यही जीवन है और इसकी सच्चाई भी।

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Drishti aur Shrishti

दृष्टि और सृष्टि……
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जब हमारी दृष्टि कमजोर हो जाती है तब हमें सारी चीजें धुंधली दिखाई देने लगती हैं ! क्या वास्तव में चीजें धुंधली होती हैं ? नही न ! बस एक चश्मा लगाते ही सब धुंधलापन समाप्त हो जाता है ।

इसी प्रकार इस संसार के प्रति जब हमारी दृष्टि दोषपूर्ण हो जाती है तो इस संसार में संसार की वस्तुओं में हमे दोष, दुःख दिखाई देने लगता है।

वस्तु में न तो सुख है, न दुःख है। ये दोष या गुण हमारी दृष्टि में है। यदि वस्तु अच्छी या बुरी होती तो वो साड़ी जो आपको अच्छी लगी और आप खरीद कर ले आये । वह साड़ी अनेक लोगों द्वारा रिजेक्ट की जा चुकी होती है।

ऐसे ही जो आपने नापसंद कीया वह भी किसी के द्वारा पसंद की जाती है। इससे सिद्ध होता है कि गुण दोष वस्तु में नहीं है। हमारी दृष्टि में है। इसलिए ये पक्का है कि संसार और वस्तुए न सुख देती हैं न दुःख ! न अच्छी हैं न बुरी।

हमारी दृष्टि ही इसका कारण है। अतः यदि सुख शान्ति चाहिए तो केवल और केवल दृष्टि को बदलना होगा। दृष्टि बदलते ही सृष्टि बदल जायेगी। हर जगह, हर हाल में, हर बात में आनंद खोजना है बस। यदि 100 व्यक्ति हमसे अधिक धनवान हैं तो अनेक व्यक्तियों से हम अधिक धनवान हैं।

जो प्राप्त है उसमे आनंदित हो। उसमे पूरा संतुष्ट रहें । अभाव अभाव न रोते रहें। मस्त रहें। क्योंकि हमारे पास कुछ भी कितना भी अधिक हो जाय फिर भी अनेकों से कम ही होगा और अनेकों से अधिक।

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Farmer and his Donkeys

A farmer was taking three of his donkeys for sale to the market.

On the way, he saw a river and decided to have a dip.

Since he had only two ropes to tie the donkeys to a tree, he looked around wondering how to tie the third one.

He saw a sage and sought his help if he could give him a rope to tie the third donkey. The sage did not have a rope but had a suggestion.

He told the farmer, “let the third donkey see you tying the other two donkeys to a tree. Then you pretend to tie this one also”.

The farmer did as he was told and went for a dip in the river. Coming back, he thanked the sage and saw that the donkeys stood exactly at the same spot where he had left them.

He untied the two donkeys and patted the third one to start moving. After going a little distance, imagine his surprise when the third donkey stood still at the same spot.

Cajoling, kicking or talking did not help with the donkey, refusing to move from the spot. The farmer went back to sage, who told him, “untie the third donkey”.

But”, protested the farmer, “I have not tied him”. The sage asked, “You know it. But does the donkey know that?

Sure enough, the farmer went back and pretended to untie the donkey. The donkey moved immediately as though released and walked over to join the other two donkeys.

Moral of the story: We are all, also tied up by too many imaginary ropes… which are really non-existent. The only truth is there are no boundaries in real life and anyone can stretch to any extent.

Keep trying. Keep thinking about your goals. You WILL achieve it. As you start moving ahead, your imaginary ropes will disappear.

Gyan ke Baatein

“ज्ञान की बातें”
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जिन्दगी में जितना हो सके दो चीजों से हमेशा दूरी बना के रखना। पहला दिखना और दूसरा दुखाना। दिखना यानि दिखावा, जो कुछ आप हैं नहीं दूसरों के सामने वो बनना, अथवा वो क्षणिक व्यवहार जो आप द्वारा एक व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए उसके साथ किया जाता है।

दुखाना यानि अपने दुर्व्यवहार से दूसरे आदमी को हतोत्साहित करना, अपमान करना, किसी की उपेक्षा करना। वाणी का वाण बन जाना ही दुखाना है।

इबादत घर छोड़कर ही नहीं होती, घर जोड़कर भी हो जाती है। इबादत भेष बदलने से ही नहीं होती, भाषा बदलने से भी हो जाती है। और बहुत बड़ा भंडारा लगाकर ही नहीं होती, किसी भूखें को एक रोटी खिलाकर भी हो जाती है।

कभी-कभी भक्त भी जाने या अनजाने अथवा किसी विगत पापमय आचरण के कारण कुछ पाप कर्म कर बैठता है ।

किन्तु यदि यह सोचकर कि “मुझे यह नहीं करना चाहिए था, किन्तु मैं इतना पापी हूँ कि मैंने फिर यह पाप किया ।” सच्चे मन से पश्चाताप करता है तो भगवान इस पछतावे के आधार पर उसे क्षमा कर देते हैं ।

किन्तु यदि वह जान-बूझकर इस आशा के साथ पाप कर्म करता है कि भगवान उसे क्षमा तो कर ही देंगे, क्योंकि वह हरे कृष्ण मन्त्र का उच्चारण करता है तो वह क्षमा के योग्य नहीं माना जाता है।

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Boiling Frog Story in Hindi

क्या आप जानते है, अगर एक मेंढक को ठंडे पानी के बर्तन में डाला जाए और उसके बाद पानी को धीरे धीरे गर्म किया जाए तो मेंढक पानी के तापमान के अनुसार अपने शरीर के तापमान को समायोजित या एडजस्ट कर लेता है|

जैसे जैसे पानी का तापमान बढ़ता जाएगा वैसे वैसे मेंढक अपने शरीर के तापमान को भी पानी के तापमान के अनुसार एडजस्ट करता जाएगा|

लेकिन पानी के तापमान के एक तय सीमा से ऊपर हो जाने के बाद मेंढक अपने शरीर के तापमान को एडजस्ट करने में असमर्थ हो जाएगा| अब मेंढक स्वंय को पानी से बाहर निकालने की कोशिश करेगा लेकिन वह अपने आप को पानी से बाहर नहीं निकाल पाएगा|

वह पानी के बर्तन से एक छलांग में बाहर निकल सकता है लेकिन अब उसमें छलांग लगाने की शक्ति नहीं रहती क्योंकि उसने अपनी सारी शक्ति शरीर के तापमान को पानी के अनुसार एडजस्ट करने में लगा दी है| आखिर में वह तड़प तड़प मर जाता है|

मेंढक की मौत क्यों होती है ??

ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि मेंढक की मौत गर्म पानी के कारण होती है|

लेकिन सत्य यह है कि मेंढक की मौत सही समय पर पानी से बाहर न निकलने की वजह से होती है| अगर मेंढक शुरू में ही पानी से बाहर निकलने का प्रयास करता तो वह आसानी से बाहर निकल सकता था|

हम इंसान है, मेंढक नहीं – Get Out of the Places that make you Uncomfortable and do not be dependent on anything

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Havan ka Mahatva

Importance of Havanहवन का महत्व….
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फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है। जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है।

इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।

हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की। क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है ? अथवा नही ? उन्होंने ग्रंथों में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी 1 किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए।

पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 % कम हो गया। यही नहीं उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से 96 % कम था।

बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था। यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (Resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर 2007 में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है ।

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Vyapaar Ek Kalaa

“व्यापार” एक कला….
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आज में आपको एक कहानी बताने जा रहा हूँ जिसमें किस तरह से एक व्यापारी अपनी सूझबूझ, चतुराई और व्यवहारिक समझ से मुनाफा कमाया..

Akelapan aur Ekaant

अकेलापन / एकांत….
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‘अकेलापन’ इस संसार में सबसे बड़ी सज़ा है! और ‘एकांत’ इस संसार में सबसे बड़ा वरदान !!

समानार्थी दिखने वाले इन दो शब्दों के अर्थ में आकाश पाताल का अंतर है।

अकेलेपन में छटपटाहट है, तो एकांत में आराम है।
अकेलेपन में घबराहट है, तो एकांत में शांति।

जब तक हमारी नज़र बाहर की ओर है तब तक हम अकेलापन महसूस करते हैं और जैसे ही नज़र भीतर की ओर मुड़ी तो एकांत अनुभव होने लगता है।

ये मानव जीवन और कुछ नहीं वस्तुतः अकेलेपन से एकांत की ओर एक यात्रा ही है ! ऐसी यात्रा जिसमें रास्ता भी हम हैं, राही भी हम हैं और मंज़िल भी हम ही हैं।

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